Debt paid by sex – Malikin ki chudai sex story – Nokar malikin sex story: बिहार के एक छोटे से गाँव में, जहाँ हरी-भरी खेतियाँ दूर-दूर तक फैली हुई थीं और हवेलियाँ पुरानी जमींदारी की गवाही देती थीं, वहाँ जीतन राम नाम का एक गरीब मजदूर अपनी पत्नी निलंजना और बेटे शक्ति के साथ रहता था। उनकी झोपड़ी जमींदार पुरुषोत्तम राय की विशाल हवेली के ठीक बाहर बनी हुई थी, जहाँ से हवेली का मुख्य दरवाजा साफ दिखता था। जीतन राम का परिवार सालों से इसी हवेली की छाँव में जी रहा था, लेकिन ये छाँव नहीं, एक बोझ था – कर्ज का बोझ।
कई पीढ़ियाँ पहले जीतन राम के दादा-पड़दादा ने जमींदार साहब से भारी रकम ब्याज पर ली थी। वो रकम इतनी बड़ी थी कि परिवार ने सिर्फ ब्याज ही चुकाया था, मूलधन जस का तस बाकी था। हर साल ब्याज बढ़ता जाता, और परिवार की कमर झुकती जाती। जीतन राम, जो अब पचास के करीब था, सुबह से शाम तक खेतों में हल चलाता, लेकिन वो कमाई सिर्फ परिवार का पेट भरने और ब्याज चुकाने में ही निकल जाती। निलंजना हवेली में झाड़ू-पोछा करती, और शक्ति, जो अब 25 साल का हो चुका था, खेतों में मजदूरी करता। शक्ति को पढ़ाई का ज्यादा मौका नहीं मिला था – बस थोड़ी-बहुत गाँव के स्कूल में, जहाँ से वो गाड़ी चलाना और थोड़ी-बहुत हिसाब-किताब सीख गया था। लेकिन जीवन की सच्चाई ये थी कि वो सब जमींदार का गुलाम ही था।
जमींदार पुरुषोत्तम राय, 35 साल के थे, पैसों से दुनिया खरीद सकते थे, लेकिन घर में औलाद का सुख नहीं था। उनकी पत्नी संध्या देवी, 25 साल की, गोरी-चिट्टी, गदराया बदन वाली औरत थीं, जिनकी शादी पाँच साल पहले हुई थी। संध्या के माँ-बाप छोटे जमींदार थे, इसलिए रिश्ता पुरुषोत्तम से जोड़ा गया। लेकिन शादी के बाद भी घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी। डॉक्टरों के चक्कर लगते, दवाइयाँ चलतीं, लेकिन कुछ फायदा नहीं। इस बात से पुरुषोत्तम और संध्या दोनों परेशान रहते। पुरुषोत्तम का स्वभाव गर्म था, छोटी-छोटी बात पर चिल्ला उठते, लेकिन संध्या शांत और समझदार थीं, घर संभालतीं और उम्मीद नहीं छोड़तीं।
एक शाम की बात है। जीतन राम अपनी झोपड़ी में बैठा रोटी-सब्जी खा रहा था। बाहर से आवाज आई – जमींदार साहब का एक नौकर आया था। “जीतन राम, साहब ने बुलाया है, जल्दी हवेली पहुँचो।” जीतन राम ने जल्दी से आखिरी निवाला निगला, मुँह पोंछा और बोला, “बोल दो, बीस मिनट में पहुँचता हूँ।” निलंजना ने चिंतित होकर पूछा, “क्या बात होगी? शाम को बुलाया है।” जीतन राम ने कंधे झटकाए, “पता नहीं, शायद खेतों का कोई काम।” वो उठा और हवेली की ओर चला गया।
हवेली में पहुँचकर जीतन राम ने सलाम किया, “हजूर, कैसे याद किया?” पुरुषोत्तम साहब कुर्सी पर बैठे सिगार पी रहे थे। उन्होंने धुआँ उड़ाते हुए कहा, “हाँ जीतन राम, आ गए हो। सुनो, मैं कारोबार के सिलसिले में एक महीने के लिए विदेश जा रहा हूँ। तुम और निलंजना दोनों अपनी मालकिन का ख्याल रखना। उनको समय पर दवाइयाँ, खाना देते रहना। कोई कमी नहीं होनी चाहिए।” जीतन राम ने सिर झुकाया, “जो हुक्म हजूर। आप निश्चिंत होकर जाएँ, मालकिन और घर की हिफाजत हमारी जिम्मेदारी है।” पुरुषोत्तम संतुष्ट लगे, “बहुत बढ़िया। तुमसे यही उम्मीद थी।” अगले ही पल वो अपनी लग्जरी कार में बैठे और हवाई अड्डे की ओर निकल गए। जीतन राम वापस झोपड़ी लौटा और परिवार को बता दिया। शक्ति ने सुना तो मन ही मन सोचा, “अब एक महीना और ज्यादा काम करना पड़ेगा।”
अगले दिन सुबह निलंजना हवेली पहुँची। संध्या देवी अपने कमरे में सो रही थीं। निलंजना ने दरवाजा खटखटाया, “मालकिन, दरवाजा खोलिए! आपके लिए खाना लेकर आई हूँ।” संध्या नींद में उठीं, दरवाजा खोला और वापस बिस्तर पर बैठ गईं। उन्होंने साड़ी पहनी हुई थी, बाल खुले थे, चेहरा थका-थका लग रहा था। निलंजना ने थाली रखी, “लो मालकिन, खाना खा लो पहले। बाद में दवाई लेने का समय हो जाएगा।” संध्या ने निवाला तोड़ा और पूछा, “आज तुम क्यों आई निलंजना? बड़े मालिक कहाँ गए हैं? सुबह से दिखाई नहीं दिए।” निलंजना ने हैरानी से कहा, “क्या बात करती हो मालकिन? आपको बताकर नहीं गए क्या जमींदार साहब?” संध्या ने निवाला मुँह में डालने से पहले रुककर पूछा, “क्या मतलब तुम्हारा निलंजना?” निलंजना ने विस्तार से बताया, “मतलब कि मालिक ने शक्ति के बाबूजी को सुबह ही बुलाया था। बोले कि बाहर विदेश में किसी काम से जाना है। इसलिए आज मालिक दिख नहीं रहे यहाँ।” संध्या ने सिर हिलाया, “अच्छा, तो ये बात है।”
खाना खत्म करने के बाद संध्या ने कहा, “निलंजना, तुम ऐसा करो, मेरी अलमारी से कपड़े निकाल दो। मुझे नहाकर दवाई लेने अस्पताल जाना है। और हाँ, आपके मालिक तो हैं नहीं यहाँ, तो आज दवा लेने किसके साथ जाऊँगी मैं? ऐसा करो, शक्ति को बुला लेते हैं खेत से। उसे गाड़ी चलाना भी आता है और थोड़ा पढ़ा-लिखा भी है, बाहर के लोगों से बोलने की तमीज भी है! क्या कहती हो निलंजना?” निलंजना ने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है मालकिन, जैसी आपकी मर्जी।” संध्या ने तुरंत मुनीम जी को फोन लगाया और शक्ति को घर भेजने को कहा। करीब आधे घंटे बाद शक्ति खेत से लौटा। उसके कपड़े धूल-मिट्टी से सने थे, पसीना बह रहा था। संध्या तैयार होकर बैठी थीं, नीली साड़ी में, बाल बंधे हुए, हल्का मेकअप।
शक्ति ने साँस लेते हुए पूछा, “हाँ जी मालकिन, क्यों बुलाया खेत से?” संध्या ने सीधे कहा, “शक्ति, तुम्हारे मालिक एक महीने के लिए कहीं बाहर गए हैं। तब तक तुम मेरे साथ हर जगह चलोगे, जैसे अस्पताल, कहीं घूमने या फिर किसी पार्टी में। समझ गए न।” शक्ति ने सिर झुकाया, “जो हुक्म मालकिन। अब कहाँ चलना है?” संध्या बोलीं, “अब हमको शहर के सबसे बड़े अस्पताल में जाना है, दवाई लेने! जाओ तुम कपड़े बदलकर तैयार हो जाओ, इन कपड़ों में अच्छे नहीं लगते हो।” शक्ति ने शर्म से सिर झुकाया, “पर मालकिन, मेरे पास इससे अच्छे कपड़े नहीं हैं।” संध्या ने भौंहें चढ़ाईं, “उफ्फ! क्या नई मुसीबत है। ठीक है, पहले नहाकर आओ। कपड़ों का बंदोबस्त मैं करती हूँ।” शक्ति चला गया। आधे घंटे बाद नहाकर लौटा, साफ-सुथरा, लेकिन पुराने कपड़ों में। संध्या ने पुरुषोत्तम साहब के कपड़े दिए – सफेद शर्ट और पैंट। “ये लो शक्ति, तुम्हारे साहब जी के कपड़े हैं। ध्यान से हिफाजत करना, फटने नहीं चाहिए। और एक बात, किसी को ऐसा न महसूस होने देना कि तुम हमारे नौकर हो। हमें आज नए अस्पताल में जाना है। उनसे ऐसे व्यवहार करना कि तुम ही जमींदार हो, इससे हमारी भी इज्जत बनी रहेगी।”
शक्ति ने कपड़े पहने तो वो खुद पुरुषोत्तम साहब जैसा लगने लगा – लंबा कद, मजबूत कंधे। दोनों कार में बैठे और शहर की ओर निकले। रास्ते में संध्या चुप थीं, बाहर देख रही थीं। अस्पताल पहुँचकर डॉक्टर ने दोनों को देखा, उम्र के हिसाब से पति-पत्नी समझा। पुरानी रिपोर्ट्स देखीं और बोले, “हाँ तो पुरुषोत्तम जी, आप बैठो और आपकी पत्नी को जरा बाहर ही बैठने को बोलो।” शक्ति ने संध्या को बाहर भेजा। डॉक्टर ने गंभीरता से कहा, “पुरुषोत्तम जी, आपकी रिपोर्ट के हिसाब से आप में कमजोरी की वजह से आपके वीर्य में शुक्राणु बनने की प्रक्रिया बहुत धीमी है।” शक्ति ने हैरानी से पूछा, “क्या मतलब आपका डॉक्टर साहब?” डॉक्टर ने साफ कहा, “मतलब साफ है, आपकी बीवी की रिपोर्ट आपसे मिलाकर देखी है, उनमें कोई कमी नहीं है। कमी आपमें है, पर आप चिंता न करो। मैं कुछ दवाइयाँ लिख देता हूँ, इनके सेवन से आप कुछ ही महीनों में शरीर में आई कमजोरी से बाहर निकल जाओगे।”
शक्ति बाहर आया। संध्या ने उत्सुकता से पूछा, “क्या बोला डॉक्टर ने शक्ति?” शक्ति ने कहा, “बात यहाँ बताने वाली नहीं है। रास्ते में बताऊँगा आपको। अब चलो यहाँ से मालकिन।” संध्या ने सहमति दी, “ठीक है, चलो।” कार में बैठकर घर की ओर चल पड़े। रास्ते में संध्या ने फिर पूछा, “अब बोलो, क्या बोला डॉक्टर ने?” शक्ति ने कार साइड में रोककर रिपोर्ट निकाली, “डॉक्टर ने कहा कि आप जमींदार साहब से कभी माँ नहीं बन पाओगी। मैं तो ज्यादा पढ़ा भी नहीं हूँ। आप खुद ही देख लो। साफ-साफ लिखा है कि उनके वीर्य में औलाद पैदा करने के कण नहीं हैं।” संध्या ने रिपोर्ट छीनी, पढ़ी और उनकी आँखें छलक पड़ीं। आँसू बहने लगे। वो फूट-फूटकर रोने लगीं, “ये कैसे हो सकता है? मैंने क्या गुनाह किया है?” शक्ति ने उन्हें संभाला, “संभालो अपने आप को मालकिन, सब ठीक हो जाएगा। डॉक्टर ने दवाइयाँ लिखकर दी हैं। जिनके सेवन से मालिक ठीक हो जाएंगे।”
संध्या ने रोते हुए कहा, “तुम नहीं जानते शक्ति, तुम्हारे मालिक कितने गर्म स्वभाव के हैं। अगर उनको ये बात पता चली तो कुछ कर बैठेंगे। क्योंकि ये उनकी इज्जत का सवाल है। तुम भी ये बात किसी से न कहना, वरना हमारे खानदान की बहुत बदनामी होगी। मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ। ये बात हम तीनों – वो डॉक्टर, तुम और मैं जानते हैं। आगे किसी चौथे को पता नहीं चलना चाहिए।” शक्ति ने उनके हाथ पकड़े, “ना मालकिन, ना। कैसी बातें करती हो? आपकी इज्जत पर आँच नहीं आने देगा ये शक्ति, चाहे उसके लिए मेरी जान क्यों न चली जाए।” संध्या ने आँसू पोंछे, “चलो गाड़ी चलाओ, मुझे अभी घर जाना है।” शक्ति ने कार स्टार्ट की, लेकिन पूरा रास्ता संध्या रोती रहीं। घर पहुँचकर निलंजना ने देखा तो पूछा, “क्या हुआ मालकिन? आपका चेहरा उतरा-उतरा सा क्यों लग रहा है?” संध्या ने झूठ बोला, “नहीं कुछ नहीं निलंजना।” निलंजना ने मजाक में कहा, “क्या हुआ, मालिक की याद आ गई क्या?” संध्या ने कहा, “हाँ, कुछ ऐसा ही समझ लो। तुम जाओ और शक्ति को मेरे कमरे में भेजो।”
निलंजना ने शक्ति को बुलाया। शक्ति कमरे में पहुँचा, “आपने बुलाया मालकिन?” संध्या ने कहा, “हाँ शक्ति, आओ और आते वक्त कमरा अंदर से बंद करते आना।” शक्ति ने दरवाजा लॉक किया और बिस्तर के पास खड़ा हो गया। संध्या ने कहा, “बोलो मालकिन, क्या हुक्म है मेरे लिए?” संध्या ने गहरी साँस ली, “देखो शक्ति, तुमसे एक बात करनी है।” शक्ति बोला, “हाँ जी, फरमाइए।” संध्या ने कहा, “तुम्हारे पुरखों ने हमारा कितना कर्ज देना है? ये तो तुम भी जानते हो!” शक्ति ने कहा, “हाँ जी पता है, बहुत बड़ी रकम है। पर आप चिंता न करो, हम आपकी पाई-पाई चुका देंगे।” संध्या बोलीं, “मुझे तुमसे एक सौदा करना है।” शक्ति ने पूछा, “कैसा सौदा मालकिन?” संध्या ने कहा, “यदि तुम चाहो तो तुम्हारा सारा कर्ज माफ हो सकता है।” शक्ति हैरान, “क्या बोला आपने मालकिन?” संध्या ने दोहराया, “हाँ, दुबारा सुनो। तुम चाहो तो तुम्हारा कर्ज माफ हो सकता है, वो भी पूरे का पूरा।” शक्ति ने कहा, “हाँ ये बात तो समझ आ गई, पर मुझे करना क्या होगा?” संध्या बोलीं, “अपनी एक बहुत ही कीमती चीज, मुझे देनी होगी। सोच लो!” शक्ति ने सोचा, “मेरे पास ऐसी क्या कीमती चीज है जिसके बदले में मेरा कर्ज माफ हो सकता है।” संध्या ने कहा, “आज रात तक सोच लो, सुबह यही आकर बात करेंगे। और हाँ, किसी से इसके बारे में जिक्र न करना। अब जाओ तुम अपने घर, सुबह टाइम से आ जाना।”
शक्ति घर लौटा। रात भर नींद नहीं आई। वो सोचता रहा – क्या चीज होगी वो? दादा-पड़दादा का कर्ज, जो सालों से चिपका है, वो माफ हो जाए? निलंजना ने पूछा, “क्या हुआ? मालकिन ने क्या कहा?” शक्ति ने टाला, “कुछ नहीं, काम की बात थी।” सुबह जल्दी उठा, नहाया, साफ कपड़े पहने और हवेली पहुँचा। कमरे के बाहर से आवाज लगाई, “मालकिन, आप उठ गईं क्या?” संध्या बोलीं, “हाँ कब की। जाओ अंदर, दरवाजा खुला ही है।” शक्ति अंदर आया, संध्या ने इशारा किया तो दरवाजा लॉक कर दिया। संध्या बोलीं, “आज इतनी सुबह-सुबह कैसे?” शक्ति ने कहा, “मालकिन, मुझे सारी रात नींद नहीं आई। यही सोचता रहा कि क्या चीज हो सकती है वो, जो हमें कर्ज से मुक्ति दिला सकती है। कहीं आप मुझसे मजाक तो नहीं कर रहीं न?” संध्या हँस पड़ीं, “बस इतनी सी बात के लिए इतनी सुबह आ गए हो?” शक्ति बोला, “हाँ जी!” संध्या ने कहा, “तुम बाहर बैठो, मैं नहाकर आती हूँ और सारी बात विस्तार से समझाती हूँ।”
शक्ति बाहर हॉल में बैठ गया। संध्या नहाकर निकलीं, गुलाबी साड़ी में, बाल गीले, बदन से साबुन की खुशबू आ रही थी। उन्होंने कहा, “शक्ति, गाड़ी निकालो। हमें अपनी दूसरे शहर वाली हवेली में जाना है।” शक्ति ने गाड़ी निकाली, संध्या बैठीं और दोनों निकल पड़े। रास्ते में शक्ति ने पूछा, “मालकिन, वो चीज क्या है?” संध्या ने कहा, “वहाँ पहुँचकर बताऊँगी।” दूसरी हवेली पुरानी थी, खाली पड़ी, ताला लगा था। संध्या ने चाबी दी, शक्ति ने खोला, गाड़ी अंदर ली और दरवाजा बंद किया। अंदर कमरे में सोफा था, संध्या बैठीं। शक्ति खड़ा रहा। संध्या बोलीं, “तुम भी बैठो शक्ति।” शक्ति ने कहा, “भला, मैं आपके साथ कैसे बैठ सकता हूँ मालकिन?” संध्या ने कहा, “कर्ज माफ कराना है तो बैठना पड़ेगा न!” शक्ति थोड़ी दूर सोफे पर बैठ गया। संध्या ने सीधे कहा, “अब सीधा मुद्दे की बात पर आते हैं।” शक्ति बोला, “जी बोलो।” संध्या ने कहा, “तुम तो जानते हो, तुम्हारे मालिक मुझे औलाद का सुख नहीं दे सकते।” शक्ति बोला, “हाँ जी तो?” संध्या बोलीं, “तो मैं चाहती हूँ तुम मेरे बच्चे के पिता बनो। मैं तुमसे वादा करती हूँ, ये बात हम दोनों में रहेगी।”
शक्ति भौचक्का रह गया। उसका मुँह खुला का खुला रह गया। संध्या ने झिंझोड़ा, “कहाँ खो गए शक्ति?” शक्ति ने कहा, “कहीं नहीं मालकिन, आपकी बात ने सोचने पर मजबूर कर दिया। परन्तु ऐसा कैसे हो सकता है? मैंने आपके बारे में ऐसा सपने में भी नहीं सोचा है।” संध्या ने समझाया, “देखो शक्ति, तुम भी जानते हो जिस कर्ज को उतारने में तुम्हारे दादा-पड़दादा नाकाम रहे, तुम अकेले उसे कैसे उतार पाओगे?” शक्ति बोला, “हाँ मालकिन, ये तो है।” संध्या ने जारी रखा, “तो तुम्हारे सिर का बोझ भी उतर जाएगा और हमें अपने खानदान को रोशन करने वाला चिराग मिल जाएगा। पर इसमें मेरी कुछ शर्तें हैं। जितना टाइम मैं चाहूँगी, तुम्हें यहाँ रहना पड़ेगा। हमारे घर ऐसे ही गुलाम बनकर, कर्ज माफ है पर काम यही करोगे। उसकी तुम्हें हर महीने तनख्वाह भी दूँगी।” शक्ति ने सोचा, फिर कहा, “ठीक है जी।” संध्या बोलीं, “जितने दिन आपके मालिक नहीं आते, आप मेरे साथ ही रात को सोओगे। मंजूर है?” शक्ति बोला, “हाँ जी मंजूर है, अब न कहने की कोई गुंजाइश भी नहीं है।” संध्या ने मुस्कुराकर कहा, “तो ये नेक काम आज से, मतलब अभी से शुरू हो जाना चाहिए।” शक्ति बोला, “जो हुक्म मेरी मालकिन।” संध्या ने कहा, “एक बात और, जब मेरे साथ हो तो मालकिन नहीं कहना। नाम लो – संध्या देवी।” शक्ति बोला, “ठीक है संध्या देवी।” दोनों हँस पड़े।
शक्ति का दिल तेज धड़क रहा था। वो उठा, संध्या को गोद में उठाया। संध्या ने हल्के से विरोध किया, लेकिन मुस्कुराईं। शक्ति ने पूछा, “किस कमरे में?” संध्या ने इशारा किया। कमरे में बड़ा बिस्तर था, धूल झाड़ी हुई। शक्ति ने संध्या को बिस्तर पर लिटाया। वो खुद को रोक नहीं पाया, सारी शर्म छोड़कर संध्या के ऊपर झुक गया। पहले माथे पर चूमा, फिर गालों पर। संध्या की साँसें तेज हो गईं। सालों बाद कोई अपनी उम्र का मर्द इतना करीब था। शक्ति ने संध्या के होंठों पर होंठ रख दिए, धीरे-धीरे चूसने लगा। संध्या ने आँखें बंद कर लीं, “आह्ह… शक्ति… कितना अच्छा लग रहा है…” शक्ति ने करीब दस मिनट होंठों का रस पिया, फिर धीरे से संध्या की साड़ी का पल्लू सरकाया। साड़ी उतार दी, ब्लाउज और पेटीकोट में संध्या और भी हसीन लग रही थीं। शक्ति ने ब्लाउज के बटन खोले, ब्रा निकाली। संध्या के गोरे, बड़े मम्मे बाहर आ गए। शक्ति ने एक मम्मा मुँह में लिया, चूसने लगा। संध्या सिसक उठीं, “ओह्ह… शक्ति… और जोर से चूस… ये तेरे लिए ही हैं… आह्ह… हाय… कितने सालों बाद…” शक्ति ने दूसरे मम्मे को हाथ से दबाया, निप्पल को उँगलियों से मसला। संध्या का बदन काँप रहा था, “आह्ह… ह्ह्ह… इह्ह… शक्ति, तू कितना अच्छा कर रहा है… मेरी चूत गीली हो गई…”
शक्ति ने पेटीकोट का नाड़ा खोला, पैंटी उतारी। संध्या की चूत साफ शेव्ड, गुलाबी, गीली हो चुकी थी। शक्ति ने उंगली से छुआ, संध्या उछल पड़ीं, “ओह्ह… ऊई… शक्ति, अब मत तड़पा… अपनी जीभ लगा…” शक्ति ने झुककर चूत चाटनी शुरू की, जीभ से क्लिट को चूसा। संध्या ने शक्ति का सिर पकड़ लिया, “आह्ह… हाँ… चाट मेरी चूत को… कितना रस निकल रहा है… ओह्ह… गों… गों… जैसे कुत्ता चाटता है वैसे चाट…” संध्या की सिसकारियाँ कमरे में गूँज रही थीं। शक्ति ने अपनी पैंट उतारी, लंड बाहर निकाला – मोटा, साढ़े पाँच इंच का, सख्त। संध्या ने देखा तो आँखें चमक उठीं, “वाह शक्ति, कितना मोटा है तेरा लंड… मेरे मालिक का तो इससे छोटा है… अब डाल दे मेरी चूत में…” शक्ति ने संध्या की टांगें फैलाईं, लंड चूत पर रगड़ा। संध्या तड़प उठीं, “शक्ति और न तड़पाओ… पहले ही बहुत तड़पी हूँ इस दिन को देखने के लिए… अब बस मेरी चूत में अपना मोटा लंड डाल दो और मेरी झोली में एक बच्चा डाल दो… मैं तुम्हें मुंह माँगा इनाम दूँगी और तुम्हारा सारा कर्ज माफ भी कर दूँगी…”
कर्ज का नाम सुनते ही शक्ति में जोश आ गया। उसने लंड सेट किया और जोर का झटका मारा। दो इंच अंदर गया, संध्या चीखीं, “आह्ह्ह्ह… दर्द हो रहा है… तंग है मेरी चूत…” शक्ति रुका, फिर धीरे से और अंदर धकेला। संध्या का दर्द मजे में बदल गया, “हाँ… अब जोर से… फाड़ दे मेरी चूत को… आह्ह… ओह्ह… कितना मोटा है… ऊई… ऊई…” शक्ति ने स्पीड बढ़ाई, दे दना दन धक्के देने लगा। संध्या भी कमर उठाकर साथ दे रही थीं, “चोद मुझे शक्ति… जोर से चोद… तेरे लंड की ताकत से बच्चा चाहिए… आह्ह… ह्ह्ह… इह्ह… गी… गी…” दस मिनट बाद संध्या झड़ गईं, “आआह्ह्ह्ह… निकल रहा है मेरा पानी… ले शक्ति… आह्ह्ह…” शक्ति ने और जोर लगाया, दस मिनट बाद वो भी झड़ा, “ले संध्या… मेरा सारा माल तेरी चूत में… आह्ह्ह…” दोनों पसीने से तर, एक-दूसरे से लिपटे लेटे रहे।
तभी संध्या का फोन बजा – पुरुषोत्तम का। संध्या ने शक्ति की बाँहों में ही उठाया। पुरुषोत्तम बोले, “कहाँ चली गई थी फोन रखकर संध्या?” संध्या ने बहाना बनाया, “जी… वो… वो… मैं नहाने आई थी बाथरूम में और फोन बेड पर ही पड़ा बज रहा था। सुनाइए, कैसे हो आप और कितने दिन वहाँ रहोगे?” पुरुषोत्तम ने कहा, “हाल बस बढ़िया है। अभी तो एक हफ्ता ही हुआ है वहाँ आए हुए। अभी एक महीना या इससे भी ज्यादा लग सकता है।” संध्या ने नाटक किया, “इतने दिन मैं कैसे रहूँगी बिन आपके? मुझे अपने साथ क्यों नहीं लेकर गए? जाते वक्त भी बताना जरूरी नहीं समझा।” पुरुषोत्तम ने माफी माँगी, “माफ कर दो मेरी जान, उस वक्त तुम सोई हुई थी तो काम के सिलसिले में यहाँ आना पड़ा। तुम्हें उठाना अच्छा नहीं लगा। सोचा, जाना तो मुझे है, इसकी नींद क्यों खराब करनी।” संध्या ने कहा, “जाओ, मुझे नहीं बात करनी आपसे,” और फोन काट दिया। दोनों हँस पड़े। संध्या बोलीं, “अब रोज ऐसा ही होगा शक्ति।”
उसके बाद उनका जवानी का खेल रोज चलने लगा। दिन में कभी खाली हवेली में, रात में संध्या के कमरे में। एक दिन संध्या ने शक्ति को बुलाया, “आज मैं तुम्हें चूसूँगी।” शक्ति लेट गया, संध्या ने लंड मुँह में लिया, “ग्ग्ग्ग… ग्ग्ग्ग… गी… गी… गों… गों…” शक्ति सिसक उठा, “आह्ह… संध्या… कितना अच्छा चूस रही हो… मेरी रानी… चूस मेरे लंड को…” फिर शक्ति ने संध्या को घोड़ी बनाया, पीछे से चोदा, “ले मेरी कुतिया… तेरी गांड कितनी मस्त है… आह्ह…” संध्या बोलीं, “हाँ शक्ति… चोद मुझे कुतिया की तरह… तेरे लंड ने मेरी चूत का भोसड़ा बना दिया… ओह्ह… ऊई… फाड़ दे…” ऐसे ही दिन बीतते गए। एक महीना कब निकला, पता नहीं चला।
फिर दोनों अस्पताल गए। डॉक्टर ने टेस्ट किए, “बधाई हो, गर्भ में बच्चा बन गया है।” खुशी से दोनों झूम उठे। पुरुषोत्तम लौट आए, लेकिन शक्ति और संध्या का गुप्त मिलन जारी रहा। समय बीता, संध्या ने बेटे को जन्म दिया। नाम रखा – शक्ति। संध्या ने पुरुषोत्तम से कहा, “शक्ति ने आपकी गैरमौजूदगी में मेरी दिन-रात सेवा की। मुझे हर जगह ले गया, जिससे बच्चा हुआ। इसके बदले उसका कर्ज माफ कर दो।” पुरुषोत्तम मान गए, कर्ज माफ किया और शक्ति को तनख्वाह पर रख लिया। इस तरह शक्ति ने लंड की ताकत से बाप-दादा का कर्ज उतारा। जीवन खुशहाल हो गया।
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