संस्कारी से रंडी बनने की यात्रा – 5 – Hindi Sex Stories – LustMasti1 min read

Dominant boss sex story – BDSM sex story: सुबह की पहली किरण बालकनी से अंदर आई तो यूसुफ ने मुझे बालों से जोर से पकड़कर खींचा, उसकी मजबूत उँगलियाँ मेरी खोपड़ी में गहरे चुभ रही थीं, एक मीठा जलन भरा दर्द सिर से गर्दन तक फैल रहा था, उसकी गरम साँसें मेरी कान की लौ पर लग रही थीं, उसकी मर्दाना खुशबू—रात के पसीने, रस और इत्र की मिश्रित तेज, नमकीन गंध—मेरी नाक में घुसकर सीधे चूत तक पहुँच रही थी, मेरी त्वचा पर एक कंपकंपी दौड़ गई, चूत की दीवारें सिकुड़ने लगीं, रस की पहली बूंद पैंटी में सोख ली।

कहानी का पिछला भाग: संस्कारी से रंडी बनने की यात्रा – 4

“उठ मेरी संस्कारी बहू, आज तेरे सारे संस्कार उतार दूँगा, तुझे अपनी सस्ती रंडी बनाकर पूरा दिन नचाऊँगा, बोल… तैयार है ना अपनी इज्जत लुटवाने को, अपनी कोख मेरे रस से भरवाने को?” उसकी आवाज में वो दबंग गरज थी जो मेरी रीढ़ की हड्डी में बिजली दौड़ा देती थी, मेरे कानों में गूंज रही थी। मैं सिहर उठी, चूत में तुरंत रस की गर्म लहर फैल गई, पैंटी एकदम तर हो गई, लेकिन अपराधबोध की एक ठंडी लहर भी दिल पर लगी, फिर भी मैंने काँपती, भीगी आवाज में कहा, “हाँ सर… तैयार हूँ… आपकी सस्ती रंडी बनने को… मेरी इज्जत लूट लो।” वो क्रूरता से हँसा, हँसी की आवाज कमरे में गूंजी, मुझे घुटनों पर धकेला, अपना मोटा लौड़ा मेरे चेहरे पर दे मारा, उसकी गर्माहट, नसों की उभरी नसें, चमड़ी की नरम खुरदराहट मेरी गाल और होंठों पर रगड़ रही थी, उसकी नमकीन, मर्दाना गंध नाक में भर गई। “चूस इसे, सुबह सुबह अपनी संस्कारी बहू का मुँह गरम कर, पूरा गले में ले,” उसने हुक्म दिया, बाल पकड़कर सिर दबाया। मैंने मुँह खोला, लौड़ा अंदर लिया, ग्ग्ग्ग… ग्ग्ग्ग… गों गों… की गीली, चिपचिपी आवाजें आने लगीं, उसका नमकीन, गाढ़ा स्वाद जीभ पर फैल रहा था, थूक बह रही थी, गला भर गया, वो मेरे सिर को पकड़कर जोर जोर से धक्के मार रहा था, गले तक घुसेड़ रहा था, मेरी थूक और उसके रस की मिश्रित गंध कमरे में फैल रही थी। “गहरा ले साली… हाँ… मेरी गुलाम रंडी… पूरा निगल… देख कितनी अच्छी संस्कारी बहू मुँह चुदवा रही है, तेरे पति को पता चले तो क्या कहेगा?” वो ताना मार रहा था, उसकी आवाज में अपमान की मिठास थी। मैं और जोर से चूस रही थी, गला दर्द कर रहा था, जलन हो रही थी, आँसू बह रहे थे, नाक से साँस ले रही थी, लेकिन चूत में आग भड़क रही थी, रस जाँघों पर बहने लगा। जब वो झड़ने लगा तो सिर दबाकर मुँह में ही झड़ गया, गर्म, गाढ़ा, चिपचिपा रस गले में उतरा, उसकी नमकीन कड़वाहट जीभ पर रह गई, “निगल सब… एक बूंद नहीं गिरनी चाहिए, बोल धन्यवाद मेरी रंडी,” उसने कहा। मैंने सब निगल लिया, गले में जलन और गर्मी फैल गई, और काँपती आवाज में कहा, “धन्यवाद सर… आपके रस के लिए… आपकी रंडी को खिलाने के लिए।” वो संतुष्ट होकर मुस्कुराया, मेरे गाल पर थप्पड़ मारा, हल्का लेकिन अपमानजनक, त्वचा पर जलन और गर्मी फैल गई।

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नहाने का हुक्म दिया। बाथरूम में गुनगुना पानी चल रहा था, भाप कमरे में फैल रही थी, शीशे पर धुंध जम गई थी, वो मुझे शीशे के सामने दीवार से सटाकर खड़ा कर दिया, मेरे हाथ ऊपर उठवाए, मेरी कलाइयाँ उसकी पकड़ में दर्द कर रही थीं, और खुद साबुन से मेरी बॉडी मलने लगा। उसकी मजबूत हथेलियाँ मेरे स्तनों पर फिरीं, जोर से मसलीं, निप्पल्स को मरोड़ा, इतना जोर कि दर्द की लहर सीने से पेट तक गई, लेकिन निप्पल्स और सख्त हो गए, मीठी जलन फैल गई। उसने मंगलसूत्र पकड़ा, लौड़े से लिपटवाया, धातु की ठंडक और लौड़े की गर्मी दोनों मेरी छाती पर लग रही थीं, “ये तेरी शादी की निशानी है ना साली, अब मेरे लौड़े से लिपटकर रहेगी, तेरे पति की जगह मैं लूँगा,” उसने ताना मारा। फिर नीचे हाथ ले गया, चूत में तीन उँगलियाँ एक साथ घुसेड़ीं, जोर से अंदर बाहर करने लगा, रस की चिपचिपी, गीली आवाज पानी की आवाज में मिल रही थी, मेरी चूत की दीवारें उसकी उँगलियों से रगड़ खा रही थीं, जलन और मजा दोनों। मैं शीशे में अपनी सूरत देख रही थी—लाल चेहरा, आँसू, होंठ कटे हुए, आँखें भूखी और शर्म से भरी। “देख अपनी सूरत, कितनी रंडी लग रही है, आँखें बंद मत करना, अपनी इज्जत टूटते देख,” उसने हुक्म दिया। मैं देखती रही, अपराधबोध और हवस लड़ रहे थे, मेरी साँसें भाप में मिल रही थीं, “सर… शर्म आ रही है… मेरी इज्जत… लेकिन और करो… और जोर से…” वो हँसा, “दर्द चाहिए मेरी रंडी को, तभी मजा आएगा।” उसने मुझे घुटनों पर बिठाया, लौड़ा फिर मुँह में डाला, पानी मेरे बदन पर गिर रहा था, गरमाहट और ठंडक दोनों त्वचा पर खेल रही थीं, वो मेरे बाल पकड़कर मुँह की ठुकाई कर रहा था। “देख… कितनी अच्छी संस्कारी बहू मुँह चुदवा रही है, बोल धन्यवाद,” वो कह रहा था। मैं ग्ग्ग्ग… गों… करती चूसती रही, उसकी गंध, स्वाद, गर्मी सब कुछ महसूस कर रही थी, जब तक वो फिर मुँह में नहीं झड़ गया, रस निगलवाया, और कहा, “अब बोल… मैं आपकी सस्ती रंडी हूँ और मेरी इज्जत आपकी है।” मैंने कहा, “मैं आपकी सस्ती रंडी हूँ सर… मेरी इज्जत आपकी है।”

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नाश्ता रूम सर्विस से आया, लेकिन खाने से पहले उसने मुझे टेबल पर झुकाया, साड़ी ऊपर की, गांड पर जोरदार चाँटा मारा, त्वचा में जलन फैल गई, लाल निशान पड़ गया, हवा लगते ही और दर्द हुआ। “खाना बाद में, पहले मेरी रंडी की गांड लाल करूँ,” उसने कहा, और चाँटे मारने शुरू किए, हर चाँटे की आवाज कमरे में गूंजती, मेरी त्वचा पर आग सी लगती, लालिमा फैलती। हर चाँटे पर मैं चीखती, “आह्ह… सर…” वो रुकता, “धन्यवाद बोल हर चाँटे के बाद, मेरी गुलाम, और माँग अगला।” मैं रोते हुए कहती, “धन्यवाद सर… और मारो… अपनी रंडी की गांड लाल करो…” दस चाँटे मारकर रुका, गांड जल रही थी, छूने पर भी दर्द, फिर पीछे से लौड़ा घुसेड़ दिया। फच फच फच… की गीली आवाजें पूरे कमरे में गूंज रही थीं, मेरे स्तन टेबल पर दब रहे थे, ठंडी लकड़ी पर निप्पल्स रगड़ खा रहे थे, वो बाल खींच रहा था, गांड पर और चाँटे मार रहा था। “बोल… किसका लौड़ा सबसे अच्छा लगता है साली, तेरे पति का या मेरा,” वो गरजा। “आपका सर… सिर्फ आपका… आह्ह… और जोर से… मैं आपकी गुलाम रंडी हूँ…” मैं चीख रही थी, कूल्हे पीछे धकेल रही थी, रस बह रहा था, जाँघें तर हो गईं। वो और तेज ठोका, मेरी चूत से गीली, चिपचिपी आवाजें आ रही थीं, मैं तीन बार झड़ी, पैर काँप रहे थे, रस की गंध कमरे में फैल गई, लेकिन वो नहीं रुका, आखिर में गांड पर और चाँटे मारते हुए अंदर झड़ गया। “अब खाना खा, मेरी रंडी,” उसने कहा, और मुझे गोद में बिठाकर खुद खिलाया, उसके लौड़े की गर्मी और रस की गंध मेरी जाँघों पर लग रही थी।

दोपहर में वो मुझे बिस्तर पर बाँधने लगा—मेरी साड़ी की चुन्नट से हाथ बाँधे, कलाइयों में कपड़ा कस गया, रगड़ खा रही थी, टाँगें फैलाईं, मंगलसूत्र को लौड़े से लिपटवाया, धातु की ठंडक और लौड़े की गर्मी दोनों मेरी छाती पर लग रही थीं। “आज तुझे पूरी तरह तोड़ूँगा, तेरी संस्कारी सोच को चूत से निकाल दूँगा,” उसने कहा, और मेरी चूत पर लौड़ा रगड़ता रहा, दाने को दबाता रहा, लौड़े की नसें मेरी चूत की दीवारों पर रगड़ खा रही थीं, लेकिन अंदर नहीं डाला, मुझे तड़पाया। मेरी चूत में आग लगी हुई थी, रस बह रहा था, चादर तर हो गई, उसकी गंध कमरे में फैल रही थी, मैं बंधी हुई छटपटा रही थी, कलाइयाँ दर्द कर रही थीं, “सर… प्लीज… घुसेड़ दो… तड़प रही हूँ… मेरी चूत जल रही है…” वो क्रूर हँसा, “माँग… अपने मुँह से बोल कि तेरी चूत मेरे लौड़े की गुलाम है और तेरी शादी की निशानी को मेरे रस से भर दो, तेरी इज्जत लूट लो।” मैं टूट गई, अपराधबोध की आखिरी लहर आई, लेकिन हवस जीत गई, “हाँ सर… मेरी चूत आपकी गुलाम है… मेरे मंगलसूत्र को आपके रस से भर दो… मेरी इज्जत लूट लो… मैं आपकी सस्ती रंडी हूँ…” तब जाकर वो घुसा, इतने जोर से कि मैं चीख पड़ी, चूत फटने जैसा दर्द, लेकिन भराव का सुकून। अलग अलग पोजिशन में ठोका—मुझे ऊपर बिठाया, कूल्हे पकड़कर उछाला, मेरे स्तन उसके मुँह में थे, वो काट रहा था, घोड़ी बनाकर बाल खींचे और गला हल्के से दबाया, साँस रुक सी गई, डर और मजा दोनों, साइड से लेते हुए निप्पल्स काटे, दाँतों के निशान पड़ गए। हर बार वो हुक्म देता, “चीख… बोल कि मैं तेरी इज्जत लूट रहा हूँ और तू खुश है,” और मैं चीखती, “हाँ सर… लूट लो मेरी इज्जत… मैं आपकी रंडी बनकर खुश हूँ…” वो मेरे मुँह में डालता, गले तक घुसेड़ता, मैं ग्ग्ग्ग… करती निगलती, उसकी गंध और स्वाद सब कुछ महसूस कर रही थी। बालकनी पर ले जाकर दीवार से सटाया, पर्दे हल्के खुले थे, नीचे सड़क दिख रही थी, लोगों की आवाजें आ रही थीं, “अब चीखना जोर से, कोई सुन ले तो तेरी संस्कारी बहू की इज्जत गई, सबको पता चलेगा तू कितनी रंडी है,” उसने कहा, और पीछे से ठोका। मैं डर गई, दिल जोर से धड़का, लेकिन मजा इतना कि चीखी, “आह्ह… सर… फाड़ दो… आपकी रंडी हूँ… कोई देख ले तो देख ले… मेरी इज्जत आपकी है…” और झड़ गई, रस जाँघों पर बह रहा था, हवा में ठंडक लग रही थी।

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वो फोन निकालकर वीडियो बनाने लगा, मेरा चेहरा छिपाकर, लेकिन मेरी चीखें और बॉडी दिख रही थी, “ये वीडियो तेरे पति को भेज दूँ तो क्या होगा, बोल साली, तेरी संस्कारी जिंदगी खत्म?” मैं डर गई, रोने लगी, आँसू बह रहे थे, लेकिन चूत और सिकुड़ गई, रस और बहा, “सर… मत भेजना प्लीज… मैं आपकी गुलाम हूँ… जो चाहो करो… लेकिन और ठोको…” वो हँसा, वीडियो बंद किया, लेकिन दिमागी खेल ने मुझे और गुलाम बना दिया, अपराधबोध और हवस की आग और भड़क गई।

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शाम तक मेरी चूत सूज गई थी, लाल हो गई थी, गांड पर लाल निशान जल रहे थे, छूने पर भी दर्द और गर्मी, चलना मुश्किल था, कलाइयों पर बंधन के निशान, लेकिन मैं खुश थी जैसे कभी नहीं, बॉडी में एक अजीब सुकून और थकान। आखिरी बार वो मुझे बिस्तर पर दबाकर ठोका, धीरे धीरे लेकिन गहरा, मेरी आँखों में देखता रहा, मंगलसूत्र पकड़कर खींचता रहा, “मेरा रस अंदर चाहिए ना मेरी गुलाम रंडी, तेरी कोख मेरे बच्चे के लिए तैयार है ना?” मैंने काँपती आवाज में कहा, “हाँ सर… भर दो… आपकी गुलाम बनकर ही जीना चाहती हूँ… आपकी कोख बनाओ मुझे।” वो जोर से ठोका, कोख में झड़ गया, गर्म रस इतना कि बहने लगा, मेरी कोख गरम हो गई, जैसे भर गई हो। हम लेटे रहे, वो मेरे बालों में उँगलियाँ फेर रहा था, उसकी उँगलियों की गर्मी महसूस हो रही थी, “अब हर दिन ऐसा ही होगा, और तेरे संस्कार हमेशा मेरे लौड़े तले कुचले जाएँगे।”

रात को अकेले में डर लगा कि कहीं गर्भ न ठहर जाए। मैंने कहा तो वो अपनी जेब से आईपिल निकाला, मुझे खिलाया, मेरे होंठों पर उंगली रखकर दबाया, “ले मेरी रंडी, अभी नहीं, जब मैं कहूँ तभी मेरी कोख भरेगी, तब तक सिर्फ मेरे लौड़े की गुलाम बन, मेरे हुक्म की तामील कर।” मैंने गोली निगल ली, उसकी कड़वाहट मुँह में फैल गई, उसके गले लग गई, उसकी दबंग आवाज में सुकून मिल रहा था, उसकी छाती की गर्मी और धड़कन महसूस हो रही थी, और चुपके से प्रार्थना की, “भगवान जी, मुझे इस गुलामी में रखना, मुझे इस दबंग मालिक का लौड़ा हमेशा मिलता रहे,” लेकिन प्रार्थना में भी उसकी गंध, उसका रस, उसकी आवाज ही घूम रही थी।

ट्रिप की बाकी रातें भी उसके हुक्म की गुलामी में बीतीं, लेकिन वो पहला पूरा दिन कभी नहीं भूलूँगी—जब मैंने खुद को पूरी तरह उसके आगे झुका दिया, हर अपमान में डूबकर, हर दर्द में तड़पकर, सबसे बड़ी खुशी महसूस की, और मेरी संस्कारी सोच हमेशा के लिए टूटकर उसके लौड़े तले कुचल गई।

कहानी का अगला भाग: संस्कारी से रंडी बनने की यात्रा – 6

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